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Chapter notes
“व्हाट हैपन्ड टू द रेप्टाइल्स” एक बहुत ही अर्थपूर्ण कहानी है जिसमें दो बड़े संदेश छिपे हैं—पहला, इंसानों को धर्म और भाषा के नाम पर लड़ना नहीं चाहिए; दूसरा, हमें प्रकृति और उसके संतुलन का सम्मान करना चाहिए। यह कहानी प्रेम नामक एक बच्चे की यात्रा के माध्यम से बताई गई है, जो एक ऐसे गाँव में पहुँचता है जहाँ साँप, छिपकली और कछुए जैसे सरीसृप (reptiles) दिखाई ही नहीं देते। वह जानना चाहता है कि ऐसा क्यों हुआ। गाँव वालों की बातों से उसे पता चलता है कि नफरत और डर चाहे इंसानों के प्रति हो या जानवरों के प्रति, उसका परिणाम हमेशा विनाश होता है। जबकि मेल-जोल और सह-अस्तित्व से जीवन सुरक्षित और सुंदर बनता है।
कहानी की शुरुआत प्रेम से होती है। प्रेम अपने गाँव से दुखी होकर निकल गया है। उसके गाँव में लोग धर्म और भाषा के नाम पर झगड़ने लगे थे। पूजा स्थलों को जलाया गया, निर्दोष लोगों को नुकसान पहुँचा और पूरे गाँव में डर व हिंसा फैल गई। प्रेम को यह नफरत सहन नहीं हुई। इसलिए उसने तय कर लिया कि वह उस गाँव में वापस नहीं जाएगा। वह एक बेहतर और शांत जगह की तलाश में निकल पड़ता है और चलते-चलते पम्बूपट्टी नामक गाँव पहुँचता है।
पम्बूपट्टी प्रेम के लिए बिल्कुल अलग अनुभव था। यह गाँव जंगल के पास एक चट्टान पर बसा था। यहाँ अलग-अलग धर्मों और भाषाओं के लोग रहते थे, लेकिन वे कभी आपस में नहीं लड़ते थे। सब एक-दूसरे का सम्मान करते थे, मिल-जुलकर रहते थे और गाँव में शांति बनी रहती थी। प्रेम यह देखकर हैरान हो जाता है कि इतनी विविधता होने के बावजूद यहाँ नफरत नहीं है। उसे लगता है कि अगर लोग चाहें तो वे बिना झगड़े के भी साथ रह सकते हैं।
कुछ समय बाद प्रेम एक और अजीब बात नोटिस करता है। उसे गाँव या जंगल के आसपास कोई भी सरीसृप नहीं दिखाई देता। आमतौर पर जंगल के पास बसे गाँवों में साँप, छिपकलियाँ और कछुए मिलते ही हैं, लेकिन यहाँ बिल्कुल नहीं। प्रेम गाँव वालों से पूछता है कि सरीसृप कहाँ गए। तब गाँव वाले उसे एक पुरानी कहानी सुनाते हैं।
गाँव वालों के अनुसार पहले पम्बूपट्टी में सरीसृप बहुत थे और लोग उन्हें प्रकृति का हिस्सा मानते थे। गाँव में मकरा नाम का एक साँप-देवता भी रहता था, जिसकी पूजा होती थी। मगर एक समय कुछ लोग डर और अज्ञानता में यह सोचने लगे कि सरीसृप खतरनाक हैं और उन्हें गाँव से भगाना चाहिए। धीरे-धीरे यह डर नफरत में बदल गया। लोगों ने साँपों, कछुओं और छिपकलियों को जंगल से निकाल देना शुरू कर दिया। मकरा को भी अपमान लगा और वह गाँव छोड़कर चला गया। उसके साथ सरीसृप भी चले गए।
पहले लोगों को लगा कि उन्होंने अच्छा काम किया है और अब गाँव सुरक्षित रहेगा। लेकिन कुछ ही समय में उन्हें समझ आ गया कि वे गलत थे। सरीसृपों के चले जाने से प्रकृति का संतुलन बिगड़ गया। चूहे बहुत बढ़ गए, मेंढक और कीड़े-मकोड़े तेजी से फैलने लगे। फसलें खराब होने लगीं और जंगल में सड़न फैल गई, क्योंकि सरीसृप प्रकृति के संतुलन में जरूरी भूमिका निभाते थे। जब वे नहीं रहे, तो नुकसान पूरे गाँव को हुआ।
गाँव वालों को अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्होंने समझा कि सरीसृप दुश्मन नहीं, बल्कि पर्यावरण का आवश्यक हिस्सा हैं। अगर हम डर से किसी प्राणी को मिटा देंगे तो उससे हमें ही हानि होगी। गाँव वालों ने पश्चाताप किया और मकरा से क्षमा माँगी। कहानी में यह भी बताया जाता है कि मकरा के बच्चे ने भी सवाल उठाया कि सरीसृपों को क्यों भगाया गया, क्योंकि अब वह देख रहा था कि उनके बिना जंगल में सड़न और कीटों की भरमार हो गई थी।
कहानी का अंत आशा और सीख से होता है। गाँव वाले वचन देते हैं कि वे हर जीव के साथ शांति से रहेंगे और प्रकृति का सम्मान करेंगे। प्रेम भी यह सीख अपने दिल में रखता है। उसे समझ आता है कि जैसे इंसानों को धर्म और भाषा के नाम पर नहीं लड़ना चाहिए, वैसे ही हमें प्रकृति में भी नफरत और डर नहीं फैलाना चाहिए। सह-अस्तित्व ही शांति और सुरक्षा की असली कुंजी है। इस तरह यह अध्याय समाज में भाईचारे और पर्यावरण में संतुलन—दोनों का महत्व बहुत सरल लेकिन प्रभावशाली तरीके से सिखाता है।
FAQs
Common questions students ask before revising this chapter.
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